ट्रैन पटरी कैसे बदलती है | ट्रैन के बारेमे पूरी जानकारी

नमश्कार दोस्तो स्वागत है आपका the24hindi में आज हम इस लेख में बात करने वाले हैं कि ट्रेन पटरी कैसे बदलती है और जब दो एक्सप्रेस ट्रेनें एक साथ एक ही स्टेशन पर पहुंचती हैं उसमेंसे एक टाइम पर पहुंचती है और एक लेट से पहुंचती है तो स्टेशन मास्टर पहले किस ट्रेन को छोड़ेगा। और जब ट्रेन क्रॉस करती है तो बाए हाथ में हरा झंडा लेकर क्यों दिखाया जाता है। रेल की पटरी को 1 किलोमीटर बिछाने में कितना खर्च आता है।

आज आप इस लेख में इन्ही सारे सवाल का जवाब पढ़ने वाले हो इस पोस्ट को हमने बोहत ही आसान भाषा मे लिखा है अगर आपको यह पोस्ट पसंद आती है तो आप नीचे दिए गए घंटी को दबाकर the24hindi को सब्सक्राइब कर सकतो हो जिससे आपको इसे ही अच्यासे अच्या knowledge मिलता रहे।

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ट्रैन पटरी कैसे बदलती है

ट्रैन पटरी कैसे बदलती है

देखिए ट्रेन में जब एक सिंगल लाइन होती है तब मेन लाइन डबल ना हो के एक ही सिंगल लाइन में होती है प्लेट फॉर्म से जब ट्रेन को छोड़ा जाता है तो बीच से एक ही ट्रेन को छोड़ सकते हैं क्योंकि बीच में डबल रास्ते नहीं होते है आने जाने के लिए तो ऐसी स्थिति में ट्रेन की क्रॉसिंग कुछ इस प्रकार से किया जाता है

जैसे कि मान लीजिए आगे से कोई एक ट्रेन आरही है तो हम दूसरे ट्रेन को रोक कर रखेंगे जब तक कि पहली ट्रेन क्रॉस ना हो जाए।

इसलिए जब एक ट्रेन को रोक कर दूसरे ट्रेन को आगे जाने दे दिया जाता है तो इसे क्रॉसिंग कहते हैं।

लेकिन आज के समय में तो डबल लाइन हैं इसलिए जब स्टेशन पर एक साथ दो ट्रेनें आती हैं तो इस में आने वाला रास्ता अलग होता है और जाने वाला रास्ता अलग होता है इसलिए जब कोई ट्रेन आती है तो दूसरे ट्रेन को रोकने की जरूरत नहीं होती है।

डबल ट्रेक होने से क्रॉसिंग कभी नहीं होती है सिंगल ट्रेक होने से ही क्रॉसिंग होती है। डबल ट्रेक होने से प्रोसीडिंग होती है  प्रोसिडिंग कैसे होती है यदि जब दो ट्रेन स्टेशन पर आती हैं तो स्टेशन मास्टर सबसे पहले किस ट्रेन को छोड़ेगा यदि मान लें कि  उसमें एक सुपर फास्ट ट्रैन होती है और एक पैसेंजर ट्रेन है तो स्टेशन मास्टर सबसे पहले सुपरफास्ट ट्रेन को छोड़ देगा, तो यहां पर सुपर फास्ट को ज्यादा वैल्यू दिया गया जहां पर किस ट्रैन को ज्यादा वैल्यू दिया जाता है तो उसे प्रोसीडिंग कहते हैं।

लेकिन यदि मान ले कि दोनों ट्रेनें सुपर फास्ट है तो उसमें एक ना एक ट्रेन जरूर लेट हुई होगी, तो अब स्टेशन मास्टर सबसे पहले किस ट्रेन को छोड़ेगा? 

इसमें इंडियन रेलवे का नियम काम आता  है कि कौन सी ट्रेन कितने लेट हुई है किस स्टेशन पर कितना लेट हुआ है उसका टाइम नोट होता है, टाइम नोट करने में उसका चार्ट बनाने में समय लगता है इसलिए जो टाइम से अपने ट्रेन आ जाती है उसे स्टेशन पर दोनों में से जो टाइम पर आई है उस ट्रेन को पहले जाने दिया जाता है नहीं तो वह भी लेट हो सकती है।

 

रेलवे ट्रैक कैसे बदलती है पुरु जानकारी

 जब रेल की पटरी बनाई जाती है तो रेलवे के पटरी के बीच खाली जगह छोड़ दी जाती है क्योंकि अगर हम उसको पास पास कर दें तो ट्रेन ढल जाएगी इसलिए उसके बीच में स्लीपर लगाया गया होता है पहले यह लकड़ी का बना होता था लेकिन अब यह सीमेंट का बना है जिससे और मजबूती मिलती है।

रेल और स्लीपर दोनों को एक साथ रखने के लिए हम एक क्लिप का प्रयोग करते हैं जो लोहे का बना होता है जिसे हम आसानी से लगाकर उसे जोड़ देते हैं।

रेल ट्रैक के किनारे बड़े-बड़े पत्थर बिछा दे जाते हैं इन पत्थरों को हम बैलेंस्ट कहते हैं यह कई कारणों से बिछाया जाता है क्योंकि रेल की पटरी को तो हमने बिछा दिया लेकिन उसमें मजबूती कहां है रेल की पटरी को मजबूत करने के लिए बड़े-बड़े पत्थर उसके किनारे बिछा दिए जाते हैं जिससे जब रेलगाड़ी रेल ट्रैक से गुजरेगी तो रेल की पटरी इधर-उधर नहीं होगी अपनी जगह पर ही स्थित होगी, और उसके साथ बरसात होने पर पत्थर के नीचे यानी ट्रेक के नीचे का मिट्टी बहता नहीं है और उस पर घास पेड़ पौधे नहीं उगते हैं।

यह पत्थर जो है कुछ सालों बाद नीचे आने पर टूटने लगते हैं जिसे फिर से रिपेयर करने की जरूरत पड़ती है इस पर 200 किलोमीटर पर घंटे के स्पीड से ट्रेन नहीं जा सकती है यदि जाएगी तो रेल के पटरी कंपन होकर हट जाएगी।

इसलिए अब कंक्रीट बैलेंसट से रेल पटरी का निर्माण किया जाता है इसमें स्लीपर के साथ कंक्रीट  कर दी जाती है जिससे इस पर आराम से बुलेट ट्रेन चलाई जा सकती है।

 

जहां पर भी बुलेट ट्रेन चलती है आपने अक्सर देखा ही होगा कि वहां कंक्रीट किया गया होता है जैसे दिल्ली में तो लोकल ट्रेन को भी कंक्रीट पर चलाया जाता है क्योंकि वहां अधिकतर ब्रिज पर ही ट्रेन चलाई जाती है क्योंकि यदि पत्थर फेंके गए होंगे तो कंपन के कारण पत्थर नीचे गिरेंगे इससे किसी को चोट भी लग जाएगी इसलिए वहां कंक्रीट रेल पटरी ज्यादा होते हैं।

 

रेलवे ट्रैक के किनारे आपने अक्सर देखा होगा की एक रेल का टुकड़ा धसा दिया गया होता है ताकि जब कोई ट्रेन बहुत ही अधिक गति से जा रही हो तो यदि जब रेल का दुर्घटना हो तो वह घसीट कर आगे तक ना जाकर उस रेल के टुकड़े में फंस जाएं जिससे ज्यादा हानि ना पहुंचे।

लोहे के जो रेल होते हैं वह कारखानों में बनते हैं वह 2 ,3 किलोमीटर लंबि नहीं बनाई जाती है वह छोटे-छोटे टुकड़ों में बनाई जाती है कुछ 10-15 मीटर लगभग जिसे आसानी से लाया जा सके और फिर उसे जोड़ दिया जाता है इसे वेल्डिंग के द्वारा जोड़ा जाता था पहले थर्मल वेल्डिंग के द्वारा जोड़ा जाता था क्योंकि इस वेल्डिंग के द्वारा इसमें काफी ज्यादा स्मार्टनेस आ जाती हैं।

सभी जगह वेल्डिंग नहीं किया जाता इसमें कुछ जगह छोड़ भी दिया जाता है क्योंकि गर्मी के समय यह फैलता है और ठंडी के समय में सिकुड़ जाता है इसलिए कुछ जगह काटकर उसमें हल्का गैप छोड़ दिया जाता है गैप छोड़ने की वजह से कहीं ट्रेन इधर उधर ना चली जाए इसलिए उसमें किनारे सटाकर एक फिश प्लेट जोड़ दिया जाता है।

रेलवे ट्रैक पर आप लोग एक जाली नुमा आकृति देखे होंगे जिसे हम रेल प्रोटेक्शन वार्निंग सिस्टम कहते हैं यह क्या करता है कि यह ट्रेन के सिग्नल के पहले लगाया गया होता है ताकि यह ट्रेन के स्पीड को रोक सके। जैसे मान लीजिए आगे सिग्नल पीला है और पीला सिग्नल में 30 के स्पीड में जाना होता है और आपका स्पीड 70 है तो यह जाली सेंसर द्वारा तुरंत लोकोमोटिक इंजन में इंफॉर्मेशन दे देता है और वह ब्रेक लगाकर स्पीड कम कर देता है।

रेलवे में हम जब जाते हैं एक शहर से दूसरे शहर तो हम मेन लाइन के सहायता से जाते हैं यह मेन लाइन  सीधे गई होती है, लेकिन जब स्टेशन पर ट्रेन आती है तो कई सारे लूप के द्वारा आती है इस लूप लाइन पर हम आसान से चल सके इसलिए इसके किनारे प्लेटफार्म बना दिया जाता है, और लूप लाइन पर स्टेशन मास्टर का काम होता है स्टेशन मास्टर ही निर्धारित करता है कि कौन से ट्रेन आगे जाएगी और पीछे जाएगी।

रेलगाड़ी की लंबाई कितनी हो सकती है और क्यों

यदि आप ट्रेन में सफर करते हैं तो आपने देखा ही होगा की कितना रिजर्वेशन का मारी मारा रहता है इतना ज्यादा भीड़ होता है लोग सोचते हैं कि ट्रेन को और लंबा क्यों नहीं बनाया जाता है !

ट्रेन में इतने कम डिब्बे क्यों होते हैं? लेकिन मालगाड़ी में ज्यादा डिब्बे क्यों होते हैं? इन्ही सारे सवालोका जवाब हम आगे देखेंगे।

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है की  डिब्बे को बढ़ाया  या घटाया  क्यों नहीं जाता है ट्रेन की लंबाई ट्रेन के पटरी लूप के ऊपर निर्भर करता है कि लूप की लंबाई कितनी है क्योंकि ट्रेन प्लेटफार्म पर रूप पर ही खड़ी होती है इसलिए लूप की लंबाई के आधार पर ही ट्रेन की लंबाई बनाई जाती है, इंडिया में लूप की लंबाई  650 मीटर है, इस हिसाब से ट्रेन की लंबाई भी  650 मीटर के अंदर होती है, चलिए इस हिसाब से हम आपको बताते हैं।

 

कितने डिब्बे एक सवारी ट्रेन में और एक मालगाड़ी में होते हैं?

एक सवारी ट्रेन में दो प्रकार के डिब्बे होते हैं एक होता है एलएचबी जिसकी लंबाई 24 मीटर होती है और 20 मीटर का इंजन होता है तो इंजन का जगह छोड़कर के 23 डिब्बे हम लगा सकते हैं यदि ज्यादा लगाएंगे तो बाद में दिक्कत आएगी।

और दूसरा डब्बा आईसीएफ होता है जिसकी लंबाई 22 मीटर होती है और 20 मीटर का इंजन होता है तो इंजन की जगह छोड़कर 25 डिब्बे हम इसमें लगा सकते हैं। यदि इससे ज्यादा डिब्बे हम लगाते हैं तो वह लूप लाइन के बाहर चला जाएगा जिससे जब दूसरी ट्रेन दूसरे ट्रैक से आएगी तो वहां पर दुर्घटना हो सकती है।

अब आप सोच रहे होंगे कि मालगाड़ी इतनी लंबी क्यों होती है

इसमें भी लगभग 2 प्रकार के डिब्बों का प्रयोग किया जाता है एक होता है जो ऊपर से खुला होता है उसकी लंबाई 10 मीटर होती है जिससे थोड़ा सा जगह इंजन के लिए छोड़ कर हम इसमें लगभग 64 डिब्बे जोड़ सकते हैं! ज्यादा डिब्बा होने की वजह से हमें लगता है कि यह बहुत लंबा होता है लेकिन ऐसा नहीं है पूरे ट्रेन की लंबाई एक सवारी के ट्रेन की लंबाई के बराबर होती है।

दूसरा डिब्बा जो ऊपर से बंद होता है उसकी लंबाई 15 मीटर होती है और इंजन के लिए थोड़ा जगह छोड़कर इसमें 42 डिब्बे लगाए जा सकते हैं। इनके डिब्बे छोटे होते हैं जिसकी वजह से हमें यह लंबे दिखाई देते हैं। हम आपको एक बात और बता देना चाहते हैं कि इंडिया में गोरखपुर में सबसे लंबा लूप लाइन है जिसकी लंबाई 1355 मीटर  है।

 

लाल झंडी या हरी झंडी क्यों दिखाई जाती है

जब किसी स्टेशन से कोई ट्रेन क्रॉस होती है

तो वहां पर एक फ्लैग मैन खड़ा होता है जो कि यह देखता है कि ट्रेन में कोई खराबी तो नहीं है ट्रेन से कोई आवाज तो नहीं आ रही है यदि उसे कुछ खराब लगता हैं तो वह लाल झंडी दिखा देता है यदि कोई खराबी  नहीं होती हैं।

तो फ्लैग मैन हरी झंडी दिखाता है अब आप सोच रहे होंगे कि ट्रेन तो आगे निकल चुकी है तो झंडे दिखाने का क्या मतलब है ऐसा नहीं है ट्रेन के पीछे एक गार्ड होता है जो कि यह देखता है कि फ्लैग कौन सा है यदि लाल फ्लैग होता है तो वह अपने माइक से तुरंत ड्राइवर को इनफॉर्म करता है की गाड़ी रोक दीजिए गाड़ी में कोई दिक्कत है लाल झंडी प्लेट फॉर्म पर दिखाई जा रही है।

 

इस ब्लॉग में हमने पढ़ा ट्रैन पटरी कैसे बदलती है हम उम्मीद करते हैं कि आपको हमारी यह जानकारी पसंद आई होगी और समझ में आई होगी यदि पसंद आई हो तो इस पोस्ट को लाइक करें और कमेंट करें और इसे अपने दोस्तों को जरूर शेयर करें।

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